आलोक वर्मा

लोगों का #उत्तरप्रदेश में अजब मिज़ाज है अगर कुछ हो तो भी नाराज़ और न हो तो भी नाराज़। अब #गोरखपुरमहोत्सव भी सुर्खियों में है और उसकी तुलना #सैफई गांव महोत्सव से हो रही है जो कि #मुलायम-अखिलेश-शिवपाल का गाँव है। जाति का उल्लेख ठीक नही है फिर भी सभी जानते है कि बाहुल्य किसका है। सरकारी और प्राइवेट जेट्स इस्तेमाल किये जाते थे बॉलीवुड हस्तियों को ढोने के लिए। बड़ी बड़ी उद्योग से जुड़ी हस्तियां सलामी बजाती थी। और यह बड़ी बॉलीवुड व उद्योग से जुड़ी हस्तियां सलामी किसको बजाती थी सिर्फ यादव परिवार को। इसके लिए पूरा सरकारी तंत्र लगता था, बड़े अधिकारी ड्यूटी बजाते थे और आवभगत का खर्च सरकार उठाती थी।

अब #गोरखपुरमहोत्सव। क्यों नही होना चाहिए। यह महोत्सव शहर के लोगों के लिए ऑर्गनाइज किया गया। न तो यह महोत्सव किसी परिवार विशेष के लिए था और न ही सलामी देने के लिए था। मुख्यमंत्री के शहर में इस महोत्सव का आयोजन निश्चित ही कोई क्राइम नही है। इस बात पर बहस हो सकती है कि महोत्सव पर कितनी फ़िज़ूलख़र्ची की गई और क्या महोत्सव का मतलब सिर्फ बॉलीवुड हस्तियों को ही बुलाना होता है।

अधिकारी तो ज़्यादातर चाटुकार होते हैं और हमेशा चाह रहती है कि कैसे प्रदेश के मुखिया को खुश करने का मौका ढूंढकर अपने नंबर हासिल करें। अगर यही अधिकारी जनता को केंद्र बिंदु मानकर किसी भी कार्यक्रम कि रुपरेखा तैयार करें तो न कि सिर्फ प्रदेश के मुख्यमंत्री को जनता द्वारा वाह वाही मिलेगी बल्कि मुख्यमंत्री को स्वयं भी स्वाभिमान महसूस होगा | लेकिन हमेशा होता है इसका उलट| इन्ह आलाह अफसरों कि सोच में जनता केंद्र बिंदु न होकर प्रदेश का राजनेता केंद्र बिंदु होता है| कार्यक्रमों का सृजन इस आधार पर होता है कि सूबे का  मुखिया खुश होगा कि नहीं | अधिकारिओं के कार्य प्रणाली में बदलाव लाने  के लिए यह ज़िम्मेदारी राजनेताओं कि बनती है कि उन्हें निर्देश साफ़ दिए जायें कि उनकी सोच जनता के हित के लिए क्या है| 

लेकिन सारा दोष सिर्फ अधिकारिओं के सर भी नहीं मढ़ा जा सकता है | समाजवादी पार्टी सरकार में या बसपा सरकार में सिर्फ यह देखा जा चुका  है कि कैसे पार्टी राजनेताओं ने प्रदेश के हर कानून और व्यवस्था की धज्जियाँ उड़ा रखी थी| न कोई कानून और न ही कोई व्यवस्था– बस लूट खसोट या अनाधिकारिक व्यवस्था| भारतीय जनता पार्टी कि सरकार अब प्रदेश में स्थापित है| लेकिन पार्टी विधायकों को या और छोटे स्तर के नेताओं को जब भी कोई मौका मिलता है तो कानून व्यवस्था से खिलवाड़ करना नहीं चूकते|

इसी कड़ी में भाजप सरकार को योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्रित्व काल में भी कई बार कई फैसलों को लेकर बैकफुट पर आना पड़ा| बीआरडी मेडिकल कॉलेज में बच्चों की मौत या ताज महल को लेकर बयान  बाज़ी या किसानों कि क़र्ज़ माफ़ी इन सभी मुद्दों को लेकर योगी आदित्यनाथ सरकार घिरी है| लेकिन गोरखपुर महोत्सव के मुद्दे को लेकर  योगी आदित्यनाथ जैसे सफाई देते नज़र आये तो ऐसा प्रतीत होता है कि वहां जो भी हुआ उसमे उनकी कोई सहमति नहीं थी | गोरखपुर के लोगों को योगी आदित्यनाथ के इस प्रकार के व्यव्हार से नाराज़गी तो हुई होगी | 

मुख्यमंत्रीयोगीआदित्यनाथ को #उत्तरप्रदेश के हर जिले में महोत्सव करवाना चाहिए ताकि वहां के लोगों को प्रदेश की लोक कला, प्रदेश के हैंडीक्राफ्ट्स और साथ ही रुचिकर मनोरंजन कार्यक्रमों में हिस्सा लेने का मौका मिल सके।

लेकिन #मुख्यमंत्रीयोगीआदित्यनाथ गोरखपुर महोत्सव को लेकर काफी रक्षात्मक से दिखे जैसे कि उनसे कोई बड़ी भारी गलती हो गयी।

मुख्यमंत्री महोदय गोरखपुर में महोत्सव मनाना अपराध नही है बल्कि उसके आयोजन के रूप को बदलने की आवश्यकता है। यह महोत्सव क्यों सिर्फ कुछ विशेष शहरों के लिये ही आयोजित किए जाते हैं। क्यों नही इनका आयोजन सैफई और गोरखपुर शहरों के अलावा प्रदेश के अन्य शहरों में भी आयोजित करने की पहल होनी चाहिए। 
उद्यमियों, कलाकारों, व्यापारियों और दर्शकों सभी लाभान्वित होंगे।

 
 
 

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